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May 11,
2015

वर्चस्व का संकट: सुप्रीम कोर्ट बनाम सरकार

Posted By : Dr. Vikas Divyakirti    Hits : 6086

(न्यायाधीशों की नियुक्ति पर चल रही रस्साकशी के बारे में अपनी ही नई पत्रिका के लिये पिछले सप्ताह लगभग 3000 शब्दों का एक विस्तृत  लेख लिखा था. एक मित्र ने उसे कुछ अखबारों को भेजा जहाँ कम शब्दों में ही पूरी बात रखनी होती है. परसों दैनिक जागरण ( राष्ट्रीय संस्करण) और दैनिक ट्रिब्यून ने उसे छापा और एकाध दिन के अंतराल पर डी.एन.ए. ने; पर हर जगह वह लेख 3000 शब्दों से घटकर 1100 शब्दों के आसपास सिमट गया. लेख की आत्मा तो नहीं मरी, पर मर्म कमज़ोर हो गया.

खैर, जिन साथियों की इच्छा पूरा लेख पढ़ने की हो, उनके लिये वह यहाँ हाज़िर है. इसके अलावा, हमारी नई-नवेली पत्रिका के प्रथम अंक में तो वह आ ही रहा है....) 

  
Apr 29,
2015

विश्व व्यवस्थाः 1914 से 2014, वैश्वीकरण की आड़ में

Posted By : Dr. Santosh Kumar Singh    Hits : 6179



2014 में प्रथम विश्व युद्ध की घटना के 100 साल पूरे हो गए। इसने पुनः विश्व व्यवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। समकालीन विश्व व्यवस्था में कई तरह के उथल-पुथल जारी हैं। इनमें से कई का संबंध वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं से भी है। वैश्वीकरण ने लाखों लोगों को गरीबी से बाहर करने में अपनी भूमिका निभाई है। लोगों एवं राज्यों की विविधता एवं परस्पर विरोधी हितों एवं मूल्यों के बावजूद भी यह तेजी से एकीकरण एवं अंतर्संबद्धता के लिए दबाव डाल रहा है। परिणामस्वरूप देशों एवं सरकारों तथा सरकारों एवं उनके नागरिकों के बीच विश्वास का स्तर चिंताजनक रूप से कम होता जा रहा है। इससे अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं समृद्धि को भी खतरा पहुँच सकता है। 

  
Apr 02,
2015

गांधी के सपनों के भारत में सांसद आदर्श ग्राम योजना के तर्ज पर ‘विधायक आदर्श ग्राम योजना’ का शुभारंभ और इसके मायने

Posted By : Mr. Vivek Ojha    Hits : 4129



पृष्ठभूमिः

आदर्श ग्रामों का विकास महात्मा गांधी के ग्रामीण विकास की संकल्पना ‘स्वराज’ को ‘सुराज’ (good governance) में बदलने की नीति पर आधारित है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ग्रामीण भारत का विकास भारत के धारणीय विकास के  लिए अत्यंत आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कृषि सहित प्राथमिक क्षेत्र के विकास की आधारशिला गाँवों में ही रखी जाती है। लार्ड रिपन द्वारा 1882 में स्थानीय स्वशासन की शुरूआत से लेकर 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक (1992) को पारित करने तक गाँवों सहित स्थानीय स्वशासन की इकाईयों को भारतीय प्रगति का वाहक माना गया। गाँवों को विकेन्द्रीकरण, सहभागिता, लोकप्रिय संप्रभुता और देश के संतुलित विकास को गति देने वाला उपकरण माना गया। 6 लाख से अधिक गाँव भारत में ग्रामीण जन आकांक्षाओं को साकार करते हैं। 

  
Mar 17,
2015

आंतकवाद : अवधारणा तथा नयी उभरती वैश्विक प्रवृत्तियां

Posted By : Mr. Vivek Ojha    Hits : 3803



‘रोमैन्टिक्स एैट वारः ग्लोरी एंड गिल्ट इन दि एज ऑफ टेरोरिज्म’ नामक पुस्तक में कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जार्ज पी. फ्लेचर ने आतंकवाद को एक सार्वकालिक घटना के रूप में बताते हुए कहा है कि, प्रत्येक युग का अपना एक शत्रु होता है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फाँसीवादियों ने बुरे कृत्य किये, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान साम्यवादी सभ्यता के दुश्मन (Nemisis) बने और आज शीतयुद्धोत्तर विश्व में आतंकवादी हिंसा और आतंक के प्राधिकृत स्वामी बन बैठे हैं। वस्तुतः आंतकवाद कोई दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, यह एक साधन है, जिसके मूल में किसी सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन की आकांक्षा निहित रहती है। यह एक हिंसक नीति है जिसमें हिंसा के माध्यम से समाज में आतंक फैलाया जाता है। आतंकवाद अपने स्वरूप और प्रकृति में विश्वव्यापी हो गया है। आतंकवादी आज विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय अलगाववादियों, उग्रवादियों, विद्रोही समूहों से गठजोड़ कर अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। एशिया से लेकर अफ्रीकी महाद्वीप में इस गठजोड़ के प्रमाण मिल रहें हैं। ताजातरीन उदाहरण अरब प्रायद्वीप के दक्षिण पश्चिम बिंदु पर स्थित देश यमन का लिया जा सकता है जहाँ अल कायदा इन अरेबियन पेनिनसुला उत्तरी यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों के साथ गठजोड़ कर चुका है।

  
Mar 02,
2015

भारतीय शिल्पकला और शिल्पकारों का सांस्कृतिक इतिहास

Posted By : Mr. Vivek Ojha    Hits : 3701

प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत के कालक्रम में शिल्पकार को बहुआयामी भूमिका का निर्वाह करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा गया है। शिल्पकार शिल्पवस्तुओं के निर्माता और विक्रेता के अलावा समाज में डिजाइनर, सर्जक, अन्वेषक और समस्याएं हल करने वाले व्यक्ति के रूप में भी कई भूमिकाएं निभाता है।  अतः शिल्पकार केवल एक वस्तु निर्माता ही नहीं होता और शिल्पवस्तु केवल एक सुंदर वस्तु ही नहीं होती बल्कि इसका सृजन एक विशेष कार्य के लिए, ग्राहक की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए किया जाता है। वस्तुतः शिल्पकार खासकर ग्रामीण भारत में एक समस्या समाधानकर्ता के रूप में कुशल भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए, उपभोक्ता या ग्राहक शिल्पकार से कह सकते हैं कि वह एक ऐसा प्याला बनाये, जिसे वे आसानी से पकड़ सकें और उससे गर्म पेय पी सकें।

  
Feb 28,
2015

मालदीव का नया राजनीतिक संकटः समस्या एवं विविध आयाम

Posted By : Mr. Vivek Ojha    Hits : 3072

हाल ही में मालदीव के विपक्षी दल के नेता और भूतपूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को आतंकवाद व देशद्रोह के दोषी के रूप में गिरफ्तार कर लिये जाने से मालदीव में राजनीतिक संकट एक बार फिर से गहरा गया है। लोकतंत्र समर्थक नशीद की गिरफ्तारी से मालदीव में लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली हो पाने में काफी समस्याएं हैं। वर्ष 2012 में एक वरिष्ठ न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद को गिरफ्तार करने का आदेश ही वर्ष 2015 में मोहम्मद नशीद की गिरफ्तारी का आधार बना है। न्यायाधीश पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत मुकदमा चलाया गया था लेकिन विरोधियों का तर्क है कि गिरफ्तारी की वजह को नशीद सरकार द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया है। यामीन अब्दुल गयूम जो कि मालदीव में 30 वर्षों तक शासन करने वाले मौमून अब्दुल गयूम के चचेरे भाई हैं, को नशीद के खिलाफ जानबूझकर षड्यंत्र रचने का साजिशकर्ता माना गया है। भूतपूर्व राष्ट्रपति नशीद द्वारा भारत से मदद मांगने पर भारत ने तटस्थता की नीति अपनाये रखी है। मालदीव के घरेलू मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप भारत के खिलाफ चीन, पाकिस्तान व मालदीव को आक्रोशित कर सकता है। भारत मानवाधिकार मूल्यों व लोकतांत्रिक प्रणाली की बहाली की अपेक्षा तो कर सकता है, लेकिन किसी देश को इसके बाध्य नहीं कर सकता, और न ही कभी उसने ऐसा किया है। यद्यपि भारत ने सदैव किसी अन्य देश के घरेलू एवं आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति अपनायी है, किसी भी राजनीतिक संकट के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपील की है लेकिन जब कोई पड़ोसी देश किसी अन्य देश का प्लेइंग कार्ड बनकर भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने की संभावना रखता हो, तो ऐसे में भारत के यथार्थवादी विदेशी नीति निर्माणकर्ताओं से ‘कुशल राजनय’ (Tactful Diplomacy) अपनाने की अपेक्षा करना जरुरी है। ऐसा माना जा रहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समक्ष सत्ता में आने के बाद नशीद की गिरफ्तारी के रूप में पहला क्षेत्रीय संकट अथवा चुनौती उत्पन्न हुई है। नशीद की गिरफ्तारी से लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों के संरक्षण की मुहिम को झटका लगेगा। राष्ट्रपति नशीद इस्लाम के उदारवादी चेहरे को सामने रख कर कार्य करने वालों में से माने जाते हैं जबकि अन्य राजनीतिक दल, वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन और भूतपूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल्ला गयूम इस्लामी मूल्यों के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। नशीद को लोकतंत्र, विकास और कूटनीति की पुनर्बहाली करने वाले दूरदर्शी नेता के रूप में जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 में राष्ट्रपति नशीद ने जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे को देखते हुए लोगों में जागरुकता व एकजुटता का संदेश देने के उद्देश्य से समुद्र के अंदर कैबेनिट मंत्रियों की बैठक आयोजित करवायी थी। इस स्तर की गंभीरता व संवेदनशीलता का कोई उदाहरण राष्ट्रपति गयूम के शासनकाल में नहीं देखा गया था। 

  
Feb 18,
2015

योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग के गठन के निहितार्थ

Posted By : Mr. Vivek Ojha    Hits : 6434



पिछले कुछ समय से भारतीय जनमानस और बुद्धिजीवियों के मध्य नीति आयोग के गठन की पहल चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बात की जाँच पड़ताल करने की कोशिशें की जा रही हैं कि क्या नीति आयोग नामकरण (Nomenclature) में परिवर्तन मात्र है अथवा भारत के समावेशी विकास के लिए योजना व नीतियों के स्तर पर संस्थागत आधुनिकीकरण (Institutional modernisation) व प्रगतिशीलता की मुहिम है। वस्तुतः भारत की आजादी के बाद से ही भारतीय राजव्यवस्था में विकेन्द्रीकरण, सहभागिता, जन-केन्द्रित नीतियाँ, लोक हित तथा समाज के सभी वर्गों के संतुलित विकास के प्रति भारत सरकार ने अपनी सद्इच्छा (good will) प्रकट की और योजना आयोग के नेतृत्व में देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की रूपरेखा तैयार की। योजना आयोग से यह अपेक्षा की गयी कि वह सुनिश्चित करें कि नागरिकों, पुरूषों और महिलाओं को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकार हो। समुदाय के भौतिक संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का बंटवारा ऐसे किया जाये जिससे ये आम हितों के लिए उपयोगी हों। आर्थिक प्रणाली के संचालन में धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण न हो जिससे आम क्षति न हो सके। 

  
Jan 10,
2015

बौद्धिक संपदा अधिकार विवाद और उसके पहलू

Posted By : Mr. Vivek Ojha    Hits : 3814

आज से कई शताब्दियों पूर्व महान विद्वान अरस्तू ने कहा था कि व्यक्ति एक ‘सामाजिक पशु’ है। आदिम समय में सभ्यता व संस्कृति का विकास अत्यंत सीमित होने के कारण व्यक्ति को पाशविक मनोवृत्तियों, आचरणों का दास माना जाता था परंतु उसमें सामाजिकता की भी संभावनाएं देखी गयी थी। अराजकता एवं अव्यवस्था होने के चलते विभिन्न संपदाओं पर कहीं ‘व्यक्तिगत स्वामित्व’ के लिए संघर्ष तो कहीं ‘सामूहिक स्वामित्व’ की वकालत की जाती थी।

⇒ महात्मा गांधी ने वर्तमान समय के 7 संरचनात्मक सामाजिक पापों (Social Sins) का उल्लेख करते हुए कहा था कि ये ऐसे घातक पाप/अपराध हैं जो हमें नष्ट कर देगें।

  
Dec 16,
2014

Declination of USA and the New World Order

Posted By : Mr. Gaurav    Hits : 2187

On the one hand, the world is changing so fast today while in Friedman's word The World Is Flat. 21st century's world has seen some radical changes and analysts says it is the Asia's century. China's president Xi Jinping proclaimed 21st century as 'decline of the west and rise of the east'.

As we see the current world order, one can easily say that US hegemony is declining and new powers are emerging whether they are economic power or military advanced countries or fast growing economies like Indonesia, Mexico, Turkey, Brazil etc. 

  
Dec 03,
2014

सरकारी कामकाज में पारदर्शिता का महत्त्व

Posted By : Mr. Gaurav    Hits : 3566

21वीं सदी का भारत, युवा भारत है जहाँ युवाओं की आकांक्षाओं, अभिलाषाओं, जीवन के प्रति सोच में बदलाव आया है। फेसबुक, ट्विटर की दुनिया ने अधिकाधिक खुलापन लाने को प्रेरित किया है और सशक्त व प्रभावी लोकपाल, सक्रिय, नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (CAG) और सूचना आयोग आदि को मिलता व्यापक समर्थन, ये सभी नवीन भारत के संकेत हैं और इन सब ने प्रशासन में पारदर्शिता, नवीनता व नवाचार (Innovation) लाने को प्रेरणा दी है।

आधुनिक उदारीकरण निजीकरण के दौर में सरकारी कामकाज का गोपनीयता वाला रवैया अब गौण महत्त्व का हो गया है और समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा शासन को अधिकाधिक पारदर्शी बनाए जाने को समर्थन दिया जा रहा है।

  
[1] 2
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